Lord Mahavira

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' जे आसवा ते परिसव्वा
जे परिसव्वा ते आसवा ''

(कोई जीव पाप के स्थान पर रहकर भी पुण्य का बंध कर सकता है और पुण्य के स्थान पर रहकर भी कोई जीव बुरे भाव के कारण पाप का बंध कर सकता है )

He second main principle of Jainism is anekāntavāda or anekantatva, a word derived from anekānta ("not one ended, sided", "many-sidedness" or "manifoldness") and vada ("doctrine", "way").